
कल शाम टहलते-टहलते हाजी के घर अचानक पहुंचा तो देखा ड्राइंग रूम में कन्वर्टिबल बेड-कम-सोफे पर उकड़ूं बैठे कार्टून नेटवर्क देख रहे थे। मैंने मज़े लिए, हाजी, कई राज्यों में मानसून सत्र चल रहे हैं। फीफा फूं-फां किए हैं, वही देख लेते किसी न्यूज़ चैनल पर। हाजी ने बिना टीवी से नज़र हटाए कहा, अमां महाकवि! क्या देखूं वहां? शाम होते ही ज़िल्ले इलाही तीतर लड़ाने लगते हैं। ऐसा लगता है कि जैसे बुद्धि का दरवाज़ा बंद कर छोटी-छोटी खिड़कियां खोल ली हों और उनमें से मुंह निकालकर तीतर चोंच लड़ा रहे हों। मैंने बैठते हुए कहा, हाजी, हम तुम्हें करते हैं, थोड़ा कुछ तो तुम भी बर्दाश्त करो।
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