
हाजी पंडित गेट से ही ‘नारायण नारायण’ की मुद्रा में बोलते हुए घुसे, ‘मुबारक हो महाकवि! मुबारक हो।’ किसी भी तरह की मुबारकबाद के ऑफ सीज़न में, मैं, चौंक पड़ा। मैंने पूछा, ‘हाजी, मेरे आस-पास तो मुबारकबाद का फिलहाल कोई माहौल है नहीं और तुम्हारी तरफ़ से तो कोई उम्मीद नहीं। फिर काहे की मुबारकबाद?’
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