
गेट खोला तो हाजी किसी सुपरमार्केट का कैटलॉग हाथ में चमका रहे थे। ‘डिस्काउंट ले लो, डिस्काउंट! जीने-मरने दोनों में वोट की परसेंट का फ़ायदा ले लो, फ़ायदा!’ रेहड़ी वाले की स्टाइल में हाजी बोले तो मुझे यह नई नौटंकी समझ में ही नहीं आई। मैंने पूछा,‘क्या हुआ हाजी? पेशा बदल लिया या ज़्यादा डिस्काउंट देखकर पगला गए?’ हाजी बोले, ‘एक बार फिर तुम्हारा नुकसान देखकर ख़ुशी से पागल हो गया हूं महाकवि!’ मैंने पूछा,‘मेरा नुकसान? ईश्वर के अलावा अपना कोई क्या नुकसान करेगा हाजी?’ हाजी मुद्दे और सामने पड़े सोफे पर एक साथ पसरे,‘4000 कवि सम्मेलन करवा रही है सरकार अटलजी की याद में। और तुम तो किसी पार्टी या सरकारी आयोजन में जाते हो नहीं तो ज्यादा तटस्थ की पूंछ बनकर फिर करा लिया न धंधे का नुकसान?’ मैंने मुद्दा समझकर चैन की सांस ली, ‘इसमें बड़ा आराम है हाजी। अव्वल तो जनता की भाषा को कविता बनाना मेरे लिए धंधा नहीं दूसरे सरकारी महफ़िलों में आदाब बजाने से काम का आदमी भी सरकारी तो ख़ैर हो जाता है पर ‘असरकारी’ नहीं रहता। ख़ैर,ये सब सरकारी पंजीरी वितरण छोड़ो, तुम तो ये बताओ हाजी ये पेट्रोल-डीज़ल की आग कब बुझेगी?’ हाजी ऊंघते हुए बोले, ‘सरकारों का तो तुम्हारी तरह हमें भी पता नहीं, लेकिन पेट्रोल-डीज़ल की ये आग जनता का तो अंतिम संस्कार करके ही बुझेगी।
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