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गडकरी जी! पाक के साथ पानी की जंग कैसे कारगर होगी, सिंधु का पानी यमुना में कैसे लाएंगे?

पाकिस्तान समर्थित आतंकियों की पुलवामा में खूनी जंग के बाद नितिन गडकरी ने भी सोशल मीडिया में पानी की जंग छेड़ दी है. 2016 में उरी हमले के बाद भी पीएम मोदी ने कहा था कि खून और पानी साथ नहीं बह सकते. पानी पर भारत और पाकिस्तान के बीच कई दशकों से खींचतान चल रही है. भारत की अधिकांश नदियों का स्रोत चीन के अधिकार में है, जो पाकिस्तान का हमदर्द और मददगार है. सर्जिकल स्ट्राइक और फिर मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा छीनने के बाद पानी पर भारत की यह रणनीति व्यवहार में कितनी कारगर होगी? सिंधु जलसंधि को रद्द करना आसान नहीं पीएम नेहरु ने चीन के दबाव में पाकिस्तानी राष्ट्रपति अयूब खान के साथ 1960 में सिंधु जलसंधि पर हस्ताक्षर किए थे. इस संधि को संसद की औपचारिक स्वीकृति नहीं मिली थी, जिस पर सांसद अशोक मेहता ने नवंबर 1960 में विरोध भी दर्ज कराया था. जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने सन् 2003 में सिंधु संधि को रद्द करने का प्रस्ताव भी पारित किया था. भारत पाकिस्तान के बीच अनेक युद्ध होने के बावजूद यह संधि रद्द नहीं हो पाई, तो अब कैसे होगी? ये भी पढ़ें: उत्तराखंड में पढ़ने वाले कश्मीरी छात्रों के लिए सरकार क्या कर रही है? सिंधु का पानी यमुना में कैसे आएगा? सतलुज यमुना लिंक नहर के निर्माण को 1986 में पूरा होना था. हरियाणा के अपने हिस्से की 92 किमी नहर का निर्माण सन् 1980 में पूरा हो गया पर पंजाब ने अपने हिस्से के 122 किमी नहर का काम एक साल में पूरा नहीं किया. इसे करने की बजाए पंजाब सरकार ने हरियाणा के साथ हुई संधि को ही इकतरफा निरस्त कर दिया. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद पंजाब सरकार ने सभी दलों की गैर-कानूनी सहमति हासिल करके, हरियाणा के साथ हुए समझौते का पालन नहीं किया और केंद्र सरकार मौन रही. हरियाणा और दिल्ली में भी यमुना नदी के पानी के बंटवारे पर खींचतान होती रहती है. कश्मीर में धारा-370 का विशेष प्रावधान है और उत्तर भारत के राज्यों में राजनीतिक विरोधाभास वाली सरकारें हैं. पाकिस्तान के साथ पानी की जंग जीतकर सिंधु के पानी को यमुना में लाने के लिए भारत के राज्यों को एकजुट करने की बडी चुनौती, चुनावी साल में कैसे सफल होगी? पाकिस्तान के साथ पानी की जंग तुरंत कारगर नहीं सिंधु जल समझौते के तहत 6 नदियों सिंधु, रावी, व्यास, झेलम, चेनाब और सतलुज नदियों के जल बंटवारे के लिए भारत और पाकिस्तान में समझौता हुआ था. इस संधि से पाक का 47 फीसदी और भारत का 39 फीसदी हिस्सा सीधे प्रभावित होता है और दोनों देशों के 30 करोड़ लोग इन 6 नदियों के पानी पर निर्भर हैं. 1948 में भारत ने सिंधु नदी से निकली नहरों का पानी रोका था, जिसके बाद से दोनों देशों में खींचतान जारी है. भारत ने इन नदियों पर भाखड़ा और पोंग जैसे बांध बनाए थे, जिनसे हरित क्रांति की शुरुआत हुई. समझौते के तहत सतलुज, व्यास और रावी के पानी पर भारत का पूरा अधिकार है. सरकार की ओर से दिए गए आंकड़ों के अनुसार, 168 मिलियन एकड़ फीट पानी में भारत का 20 फीसदी यानी 33 मिलियन पानी पर हक है. भारत इसका 93-94 फीसदी ही इस्तेमाल कर पाता है और बकाया पानी पाकिस्तान चला जाता है. भारत में पानी के पूरे इस्तेमाल के लिए कई सालों से रावी व्यास लिंक का दूसरा फेज, रावी की सहायक नदी ऊझ परियोजना और शाह परियोजनाओं पर काम चल रहा है. इनमें से कई परियोजनाओं को राष्ट्रीय परियोजना भी बताया जा रहा है. सरकारी अधिकारियों के अनुसार जल का प्रवाह रोकने के लिए 100 मीटर की उंचाई वाले बांध बनाने होंगे, इसलिए गडकरी की योजना के क्रियान्वयन में 6 साल तक का वक्त लग सकता है. भारत में नदियों को जोड़ने की आईएलआर योजना देश के कई इलाके बाढ़ग्रस्त रहते हैं और कई इलाकों में सूखा होता है. पानी के समान वितरण के लिए देश में नदियों को जोड़ने की परियोजना (ILR) पर आजादी के बाद से काम कम बातें ज्यादा हो रही हैं. अटल जी की सौगात बताए जाने वाले आईएलआर प्रोजेक्ट को सुप्रीम कोर्ट ने सन् 2012 में हरी झंडी दे दी थीं. मोदी सरकार ने शपथ ग्रहण के बाद इस प्रोजेक्ट के लिए राष्ट्रीय समिति और फिर टास्कफोर्स का गठन करके इसे बड़ी उपलब्धि के तौर पर प्रचारित किया था. सरकार की ओर से जारी सूचना के अनुसार आईएलआर के तहत उत्तर भारत में 14 और प्रायद्वीप में 16 प्रोजेक्टों पर विचार हो रहा है. पंजाब जैसे राज्यों में भी अब जलसंकट बढ़ने लगा है तो फिर अन्य राज्य भी पानी की अधिक उपलब्धता को स्वीकार नहीं कर रहे जिससे पूरा मामला अटका है. आईएलआर प्रोजेक्ट के तहत मीटिंगों और डीपीआर बनाने में खरबों रुपया बर्बाद हो रहा है और देश में जल संकट निरंतर बढ़ता जा रहा है. ये भी पढ़ें: पुलवामा की ‘केमिस्ट्री’ से सुधरेगा बीजेपी का ‘अंकगणित’? भारत में पानी पर राज्यों के अंर्तविरोध संविधान के अनुच्छेद-262 और केंद्र सूची की प्रविष्टि-56 में दिए गए हक के बावजूद पानी और नदियों पर केंद्र सरकार का कोई अधिकार नहीं है. केंद्र सरकार ने पानी को समवर्ती सूची पर लाने के लिए कई बार कानूनी पहल की है, पर राज्यों के साथ सहमति नहीं बन पा रही है. विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, भारत जैसे जलसंकट वाले देशों को सन् 2050 तक जीडीपी में 6 फीसदी तक की हानि हो सकती है. शिक्षा और स्वास्थ्य की तरह पानी भी यदि समवर्ती सूची में आ जाए तो भारत में जलसंकट से निपटने में आसानी होगी. देश में गहराते जलसंकट के समन्वित समाधान की बजाए नेता राज्य स्तर पर ओछी राजनीति करते हैं, तो फिर पाकिस्तान से हम पानी की जंग कैसे जीतेंगे? संधि तोड़ने में चीन के साथ अंतर्राष्ट्रीय बाधा भारत अपने हिस्से के पानी का ही इस्तेमाल नहीं कर पा रहा तो फिर सिंधु संधि को तोड़ने की बात करना बेमानी ही है. भारत के किसी कदम से पाकिस्तान में यदि खेती और बिजली का संकट बढ़े तो पाकिस्तान में कट्टरपंथी ताकतों की मजबूती के साथ चीन का हस्तक्षेप भी बढ़ेगा. भारत में सिंधु, ब्रहमपुत्र समेत अनेक नदियों का उद्गम चीन या तिब्बत में है. पाकिस्तान की मदद के लिए यदि चीन ने भी नापाक पहल की तो भारत में बाढ़ के साथ जलवायु संकट भी बढ़ सकता है. तीसरा विश्व युद्ध पानी के लिए होने की संभावना है, इसलिए भारत से पानी लेने के लिए अब पाकिस्तान को ही खूनी जंग बंद करनी चाहिए.

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