इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने कहा है कि आधार कार्ड में दिए गए नाम, लिंग, पता और जन्मतिथि जैसे तथ्यों का ठोस सबूत नहीं माना जा सकता. साथ ही, आपराधिक मामलों की जांच में संदेह होने पर इनकी पड़ताल की जा सकती है. न्यायमूर्ति अजय लांबा और न्यायमूर्ति राजीव सिंह की पीठ ने हाल में दिए गए एक फैसले में कहा कि साक्ष्य अधिनियम के तहत यह नहीं कहा जा सकता कि आधार कार्ड में दिए गए नाम, पता, लिंग और जन्मतिथि का विवरण उनके सही होने का ठोस सबूत है. इस विवरण पर अगर सवाल उठता है और खासतौर आपराधिक मामलों की जांच के दौरान जरूरत पड़ने पर इनकी पड़ताल की जा सकती है. कोर्ट ने बहराइच के सुजौली थाना में दर्ज एक मामले की वैधता को चुनौती देने वाली एक याचिका पर सुनवाई करते हुए हाल ही में यह आदेश दिया था. अब शेयर की गई अपनी जानकारी वापस लेने का मिलेगा ऑप्शन इधर सरकार आधार एक्ट में संशोधन करने के प्रस्ताव को अंतिम रूप देने के आखिरी चरण में है. इस संशोधन के बाद सभी नागरिकों को बायोमेट्रिक्स और डेटा समेत अपना आधार नंबर वापस लेने का विकल्प दिया जा सकेगा. ऐसा सितंबर में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद किया जा रहा है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कुछ शर्तों के साथ आधार कार्ड की अनिवार्यता खत्म कर दी थी. हालांकि कुछ चीजों के साथ आधार की वैधता को बरकरार रखा गया. सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने आधार एक्ट के सेक्शन 57 को रद्द कर दिया था, जो प्राइवेट कंपनियों को वेरिफिकेशन के नाम पर आधार नंबर देने को बाध्य करता है. बेंच ने यह भी माना था कि बैंक खातों और सिम कार्ड से आधार नंबर जोड़े जाने की बाध्यता असंवैधानिक है.
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